Tuesday

 

Job के Stress को घर मत लाओ: 3 EQ Tools जो आपके काम और रिश्तों दोनों को बचा सकते हैं

क्या ऑफिस का तनाव घर पहुंचते ही आपके व्यवहार में दिखने लगता है?
अगर छोटी-सी बात पर गुस्सा आ जाता है, partner की सामान्य बात भी irritating लगती है, बच्चों के सवालों का जवाब देने का मन नहीं करता या घर पहुंचने के बाद भी दिमाग में boss, deadlines, meetings और pending work चलता रहता है—तो समस्या सिर्फ “काम का stress” नहीं है।

समस्या यह है कि आपका शरीर ऑफिस से घर आ गया है, लेकिन आपका nervous system अभी भी ऑफिस में ही अटका हुआ है।

आज के कामकाजी जीवन में यह अनुभव बहुत आम होता जा रहा है। Long working hours, constant messages, deadlines, performance pressure और काम के बाद भी digital connectivity व्यक्ति को मानसिक रूप से “ऑफ” होने नहीं देती। भारत में Deloitte की 2025 Gen Z & Millennial Survey में भी 36% Indian Gen Z और 39% Indian millennials ने job को अपनी anxiety या stress में महत्वपूर्ण योगदान देने वाला factor बताया।

लेकिन एक महत्वपूर्ण सवाल है:

क्या हम job का stress घर आने से पहले regulate करना सीख सकते हैं?

हाँ।

इसके लिए आपको हर बार लंबी meditation या घंटों की therapy की जरूरत नहीं होती। कई situations में Emotional Intelligence (EQ) के छोटे लेकिन structured tools आपको अपनी emotional state पहचानने, regulate करने और घर में बेहतर तरीके से उपस्थित रहने में मदद कर सकते हैं।

इस article में हम ऐसे ही 3 practical EQ tools समझेंगे।


सबसे पहले समझिए: Job Stress घर तक क्यों आता है?

मान लीजिए ऑफिस में आपके manager ने आपकी मेहनत को appreciate नहीं किया।

आपने कुछ नहीं कहा।

आपने काम पूरा किया और शाम को घर निकल आए।

लेकिन रास्ते भर आपके दिमाग में चलता रहा:

“मैं इतना काम करता हूँ, फिर भी इन्हें दिखाई नहीं देता।”

घर पहुंचते ही partner पूछता है:

“आज इतनी देर क्यों हुई?”

सवाल सामान्य था।

लेकिन आपका brain उसे एक और demand की तरह interpret कर सकता है।

आप अचानक बोलते हैं:

“पूरे दिन काम करके आया हूँ, आते ही सवाल शुरू मत करो!”

Partner को समझ नहीं आता कि इतनी सामान्य बात पर इतना गुस्सा क्यों आया।

यहीं से workplace stress relationship conflict में बदल सकता है।

Stress का एक common pattern होता है:

Work Pressure → Emotional Build-up → No Emotional Processing → Home → Trigger → Irritation → Conflict → Guilt

और अगले दिन वही cycle दोबारा शुरू हो जाती है।

यही कारण है कि Emotional Intelligence सिर्फ workplace skill नहीं है।

EQ आपकी professional life के साथ-साथ आपकी personal relationships को भी प्रभावित करता है।


EQ Tool 1: “Name It Before You Blame It”

जब हम stressed होते हैं, तो अक्सर अपनी emotion को पहचानने के बजाय दूसरे व्यक्ति को blame करते हैं।

उदाहरण:

❌ “तुम मुझे समझते ही नहीं हो।”

❌ “घर में किसी को मेरी परेशानी की परवाह नहीं है।”

❌ “सब मुझे परेशान करने में लगे हैं।”

लेकिन असली emotion शायद कुछ और हो सकती है:

  • Frustration

  • Disappointment

  • Anxiety

  • Overwhelm

  • Rejection

  • Helplessness

  • Exhaustion

इसलिए पहला EQ tool है:

Emotion को Name करें, Person को Blame नहीं।

घर पहुंचने से पहले खुद से सिर्फ तीन सवाल पूछें:

1. मैं अभी क्या महसूस कर रहा हूँ?

2. इस emotion की intensity कितनी है?

3. इसका असली कारण क्या है?

उदाहरण:

“मैं गुस्से में हूँ।”

थोड़ा गहराई से देखें:

“असल में मैं गुस्से से ज्यादा frustrated हूँ।”

और फिर:

“मुझे frustration इसलिए है क्योंकि आज मेरी मेहनत acknowledge नहीं हुई।”

यह छोटा-सा बदलाव बहुत powerful है।

क्योंकि जब आप कहते हैं:

“तुमने मुझे परेशान कर दिया।”

तो conflict शुरू होता है।

लेकिन जब आप कहते हैं:

“आज ऑफिस में मैं बहुत frustrated था और शायद उसका असर अभी मेरे व्यवहार पर आ रहा है।”

तो conversation की दिशा बदल जाती है।

याद रखें:

Unidentified emotion अक्सर behavior बनकर बाहर आती है।

इसलिए:

Name the emotion before you act on the emotion.


EQ Tool 2: 10-Minute “Emotional Transition Ritual”

एक common mistake है:

Office से सीधे घर → घर के काम → family conversation → dinner → phone → sleep

लेकिन आपका brain इतनी तेजी से professional mode से personal mode में switch नहीं कर पाता।

इसलिए आपको एक छोटा transition ritual चाहिए।

इसे आप अपने लिए “10-Minute Emotional Reset” बना सकते हैं।

घर पहुंचने से पहले 10 मिनट निकालिए।

Step 1: STOP

अपने phone को कुछ मिनट के लिए side में रखिए।

काम से संबंधित notifications check करना बंद करें।

Step 2: BREATHE

धीरे-धीरे कुछ deep breaths लें।

लक्ष्य stress को जबरदस्ती खत्म करना नहीं है।

लक्ष्य है अपने शरीर को signal देना:

“अब मैं सुरक्षित हूँ। अब मुझे react नहीं करना है।”

Step 3: RELEASE

खुद से पूछें:

“आज ऑफिस में ऐसी कौन-सी बात है जिसे मैं अभी भी अपने साथ लेकर चल रहा हूँ?”

उसे mentally acknowledge करें।

फिर खुद से कहें:

“यह समस्या महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन मुझे इसे अभी घर में carry करने की जरूरत नहीं है।”

Step 4: RESET

अपने लिए एक intention तय करें:

“अब अगले कुछ घंटों के लिए मैं employee नहीं, partner/parent/family member हूँ।”

यह छोटी-सी mental boundary बहुत उपयोगी हो सकती है।


EQ Tool 3: “Pause–Choose–Respond”

सबसे ज्यादा damage stress तब करता है जब हम emotion और response के बीच कोई gap नहीं रखते।

Partner ने कुछ कहा।

आपने तुरंत जवाब दे दिया।

बच्चे ने कुछ पूछा।

आपने चिड़कर बोल दिया।

किसी ने phone किया।

आपने irritation दिखा दी।

यानी:

Trigger → Reaction

Emotional Intelligence हमें एक तीसरा step जोड़ना सिखाता है:

Trigger → Pause → Choose → Response

इसे Pause–Choose–Respond technique की तरह इस्तेमाल करें।


PAUSE

जब आपको लगे कि आप react करने वाले हैं, तो 5–10 seconds रुकें।

कुछ मत बोलिए।

बस pause करें।


CHOOSE

खुद से पूछें:

“मैं अभी क्या achieve करना चाहता हूँ?”

क्या आप:

  • अपनी frustration निकालना चाहते हैं?

  • सामने वाले को चोट पहुंचाना चाहते हैं?

  • या situation को बेहतर बनाना चाहते हैं?


RESPOND

अब जवाब दें।

उदाहरण:

Partner:

“आज फिर बहुत देर हो गई।”

Stress response:

“तुम्हें तो बस शिकायत करनी आती है!”

EQ response:

“आज दिन बहुत stressful था। मुझे थोड़ा time दो, फिर आराम से बात करते हैं।”

दोनों responses में emotion है।

लेकिन दूसरे response में emotional control और communication skill है।

यही Emotional Intelligence का practical use है।


एक महत्वपूर्ण बात: Stress को दबाना और regulate करना अलग है

कई professionals सोचते हैं:

“मैं अपना stress घर पर दिखाता नहीं हूँ।”

लेकिन stress को छिपाना और regulate करना एक चीज नहीं है।

अगर आप पूरे दिन emotions दबाते हैं और रात में अचानक छोटी बात पर explode कर जाते हैं, तो आपने stress manage नहीं किया।

आपने सिर्फ उसे postpone किया।

Emotional regulation का मतलब है:

Emotion को महसूस करना + समझना + स्वीकार करना + उचित तरीके से express करना।

इसका मतलब यह नहीं है कि आपको हमेशा calm रहना है।

आप इंसान हैं।

आप frustrated होंगे।

आप angry होंगे।

आप tired होंगे।

आप overwhelmed भी होंगे।

EQ का उद्देश्य emotions को खत्म करना नहीं है।

EQ का उद्देश्य है कि emotions आपके decisions और relationships को control न करें।


क्या आपका Job Stress आपके Relationship को प्रभावित कर रहा है?

इन सवालों का honestly जवाब दीजिए:

  • क्या ऑफिस से आने के बाद आपका mood जल्दी खराब हो जाता है?

  • क्या partner की छोटी बात भी आपको irritate करती है?

  • क्या आप घर पर emotionally available नहीं रह पाते?

  • क्या आपका mind dinner या family time के दौरान भी काम में लगा रहता है?

  • क्या आप बार-बार कहते हैं, “अभी बात मत करो”?

  • क्या weekends में भी work-related thoughts चलते रहते हैं?

  • क्या आपको लगता है कि आप अपने परिवार के साथ physically मौजूद लेकिन emotionally absent रहते हैं?

  • क्या आपको बाद में अपने behavior पर guilt होता है?

अगर इनमें से कई सवालों का जवाब हाँ है, तो शायद आपको केवल time management की नहीं, बल्कि emotional regulation और healthy boundaries की जरूरत है।


एक Simple “Office से Home” EQ Checklist

अगली बार घर जाने से पहले इसे try करें:

STOP → NAME → RESET → CHOOSE

STOP

मैं अभी रुक रहा हूँ।

NAME

मैं क्या महसूस कर रहा हूँ?

RESET

क्या मैं ऑफिस की emotion को घर लेकर जा रहा हूँ?

CHOOSE

घर पहुंचने के बाद मैं किस तरह का partner/parent/family member बनना चाहता हूँ?

सिर्फ 2–5 मिनट का यह practice आपके emotional transition को बेहतर बनाने की शुरुआत कर सकता है।


याद रखिए: आपका परिवार आपका Stress Dumping Ground नहीं है

यह बात थोड़ी uncomfortable है, लेकिन जरूरी है।

आपका job stressful हो सकता है।

आपका boss difficult हो सकता है।

आपकी deadlines real हो सकती हैं।

आपके ऊपर responsibilities बहुत हो सकती हैं।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आपके घरवालों को आपके unresolved stress की कीमत चुकानी पड़े।

आपका परिवार आपके stress का कारण नहीं है—इसलिए उन्हें उसका target भी नहीं बनना चाहिए।

और इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है:

आपको अपने emotions दबाने की जरूरत नहीं है।

आप अपने partner से कह सकते हैं:

“आज मेरा दिन बहुत खराब था। मुझे 20 मिनट decompress करने दो, उसके बाद मैं तुम्हारे साथ properly बात करना चाहता हूँ।”

यह avoidance नहीं है।

यह healthy emotional boundary है।


Relationship में Emotional Intelligence क्यों जरूरी है?

एक healthy relationship का मतलब यह नहीं कि दोनों partners कभी stressed, angry या frustrated नहीं होंगे।

Healthy relationship का मतलब है कि दोनों partners यह सीखते हैं कि:

“मेरी emotion मेरी responsibility है।”

मैं अपने partner से support मांग सकता हूँ।

लेकिन मैं अपनी frustration का पूरा भार partner पर नहीं डाल सकता।

यही emotional maturity है।

और यही कारण है कि relationship coaching में केवल communication techniques पर काम करना पर्याप्त नहीं होता।

कई बार communication problem के पीछे असली समस्या होती है:

Unmanaged emotions + accumulated stress + poor emotional awareness.

जब व्यक्ति अपनी emotions को पहचानना और regulate करना सीखता है, तो communication naturally बेहतर होने लगती है।


अंतिम बात: घर पहुंचने से पहले खुद को “घर” पहुंचाइए

आप हर दिन ऑफिस से घर जाते हैं।

लेकिन सवाल यह है:

क्या आपका मन भी आपके साथ घर आता है?

अगर आपका शरीर घर पर है लेकिन आपका दिमाग अभी भी meeting, boss, deadline और pending emails में उलझा है, तो आपके परिवार को आपका physical presence तो मिलेगा—लेकिन आपका emotional presence नहीं।

इसलिए आज से एक छोटा experiment शुरू कीजिए।

घर पहुंचने से पहले खुद से पूछिए:

“मैं अभी कौन-सी emotion अपने साथ घर लेकर जा रहा हूँ?”

फिर पूछिए:

“क्या मैं इसे अपने परिवार पर डालना चाहता हूँ, या पहले इसे regulate करना चाहता हूँ?”

यही छोटा pause आपके reaction और response के बीच एक नया रास्ता बना सकता है।

क्योंकि successful career महत्वपूर्ण है, लेकिन ऐसा career बनाना ज्यादा महत्वपूर्ण है जिसकी कीमत आपके रिश्तों को न चुकानी पड़े।


अगर Job Stress आपके Relationship को प्रभावित कर रहा है…

अगर आपको लगता है कि work stress, emotional overload, communication problems या लगातार irritation आपके relationship को प्रभावित कर रहे हैं, तो समस्या को केवल “थोड़ा adjust कर लो” कहकर ignore करना जरूरी नहीं है।

एक Relationship & Emotional Intelligence Coach के रूप में मैं professionals और couples को अपनी emotional patterns समझने, communication बेहतर करने और relationships में practical change लाने के लिए structured coaching tools के साथ काम करने में मदद करता हूँ।

Relationship में बदलाव हमेशा बड़ी चीजों से शुरू नहीं होता।

कई बार शुरुआत सिर्फ एक छोटे सवाल से होती है:

“मैं अभी क्या महसूस कर रहा हूँ—और उसके साथ मैं क्या करने वाला हूँ?”

— Mohan Chakravaishya
Certified Relationship & Marriage Coach | Emotional Intelligence Expert
Unlock YOU Academy


क्या आप सफल होने को तैयार है ?

दोस्तों हम सब अपनी जिंदगी में सफल होना चाहते है कोई कैरियर में, कोई व्यवसाय में, कोई जिन्दगी की जद्दोजहद में लेकिन क्या आपने सोचा है की आखिर कौन सी ऐसी बातें या आदतें या विचार होंगे जो आपको सफल बनायेंगे ?

आइये आज सफलता के ऐसे ही मानकों को जानते है जो आपको सफल बनायेंगे !
# आत्म मूल्यांकन करें : जब आप अपनी बाइक / गाडी से कहीं जाते है तो सबसे पहले उसे अच्छी तरह जांचते है की कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं है, सारे पार्ट्स ठीक से काम कर रहे है न आदि आदि । वैसे ही आपकी सफलता की राह में आपकी सारी आंतरिक शक्तियों का ठीक से से काम करना भी जरुरी है ।
आपने अनुभव किया होगा की सुबह से शाम तक हमारे मन में अनेकों विचार जैसे गुस्सा, चिंता, परेशानी, दोस्त व दूसरों के व्यवहार, अचानक की विपरीत परिस्थिति, शारीरिक कष्ट, परिवार का तनाव आदि आते है जो कई बार नकारात्मक प्रभाव डालते है । इस प्रभाव में आने से आपके जोश, कार्यक्षमता, लगनशीलता, लक्ष्य के प्रति समर्पण में कमी आ जाती है । इसलिए प्रतिदिन कम से कम 10 मिनिट खुद को इस कसौटी में परखें कि क्या सही-गलत हुआ और अब क्या बेहतर करना है ।
ध्यान रहे तमाम समस्यायों के बाद भी आपको सिर्फ समाधान की तरफ ही बढ़ाना है यही आपकी सफलता की पहली सीढ़ी होगी । कहते है न -
मंजिल तो मिल ही जायेगी, भटके हुए मुसाफिर को,
गुमराह तो वो है, जो घर से निकले ही नहीं ।।

# अपना व्यक्तित्व स्वयं गढ़ें : याद रखो आपके सार्थक प्रयासों के अलावा, दुनिया का कोई भी इंस्टिट्यूट आपका व्यक्तित्व नहीं बना सकता । अर्जुन की तरह लक्ष्य भेदना है तो अपने साधन (सकारात्मक विचार / अध्ययन सामग्री), एकाग्रता, आत्म-नियंत्रण और साध्य (जिस लक्ष्य को पाना चाहते है) पर ध्यान देना होगा । आपकी सफलता के लिए बाधक (नकारात्मकता) और साधक (सकारात्मकता) कारकों को पहचानकर नियमित सुधार करते रहना होगा । कुछ आदतों को बदलते हुए अपने व्यव्क्तित्व को निखारने में प्रयासरत रहें ।
सफलता के बाधक (इन्हें घटाना है) : डर, नफरत, घमंड, क्रोध, ईर्ष्या, लालच, निराशा व हिंसा
सफलता के साधक (इन्हें बढ़ाना है) : प्रेम, अपनापन, मददगार, परस्पर सम्मान, सीखने की इच्छाशक्ति, समर्पण व संवेदनशीलता

# अच्छी दिनचर्या से शुरुआत करें :  सोचो यदि रेलवे की ट्रेनें बिना टाइम टेबल चले, आपकी स्कूल-कालेजों की परीक्षाएं बिना निर्धारित योजना व कार्यक्रम से होने लगे तो कैसा माहौल बनेगा ? अव्यवस्था फ़ैल जायेगी न ? बस कुछ ऐसी ही अव्यवस्था अनजाने में बहुत से लोगों के जीवन में चल रही है शायद उसमे आप भी शामिल हों !
अपने लक्ष्य (करियर अथवा जीवन) को ध्यान में रखकर एक वृहद कार्ययोजना (कब, कैसे और किस साधन) बनायें, फिर उसी के अनुसार अपने कार्य निर्धारित करें ।
अपनी योजना को अमल में लाने के लिए दैनिक कार्यों का टाइम टेबल बनाना चाहिए और रोज के टास्क को नियमित रूप से पूरा करें ।
सुबह की शुरुआत खुशनुमा व प्रेरणादायी होनी चाहिए यह आपको दिनभर सेल्फ-मोटिवेट करेगा । अतः कोई प्रेरक किताब पढ़ें, ऑडियो/विडियो लेक्चर सुनें अथवा किसी पॉजिटिव थॉट्स का वालपेपर मोबाइल स्क्रीन में लगा लें ।
अपने दैनिक लक्ष्य को पाने के लिए मेहनत करें, शॉर्टकट के चक्कर में न आये । अपने टारगेट और अचीवमेंट को हर शाम जाँचें ।

# लक्ष्य पर हमेशा नजर रखें : अक्सर ऐसा होता है की योजना भी बन गई और कुछ दिन आगे भी बढ़े लेकिन चौथे दिन तक सब बदल सा जाता है आखिर क्यों ? जिस तरह प्यास लगने पर जब तक पानी नहीं मिलता तब तक आपका शरीर चैन नहीं पाता ठीक वैसे ही आपको भी लक्ष्य को पाने की तड़प होनी चाहिए । आपका हर एक्शन-रिएक्शन आपके लक्ष्य की तरफ ही होना चाहिए । कुछ नया सीखें या पुराना कार्य करें इस बात का ध्यान रखें की यह आपके उद्देश्य से जुड़ा व सार्थक हो ।
सही दिशा में किया गया निरंतर प्रयास ही आपको सफल बनाने वाला है अब खुद ही सोचो सफल बनना है या फिर .......

Wednesday

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iz-31  Hkkjr ljdkj vf/kfu;e 1935 us lekIr dhA
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 ¼l½    Hkkjr dh la?kh; lajpuk                                    ¼n½     ftEesnkj dsfUnz; ljdkj
iz-32  1878 dk oukZD;qyj izsl ,DV fdlus 'kq: fd;k FkkA
        ¼v½     ykMZ fjiu    ¼c½ ykMZ fyVu       ¼l½     ykMZ dtZu       ¼n½     ykMZ feUVks
iz-33  fdl dzkafrdkjh us dh e`R;q 64 fnuksa ds miokl ds ckn gks x;h FkhA
        ¼v½     iqfyu nkl    ¼c½ tfrunkl        ¼l½     lw;Zlsu          ¼n½     jklfcgkjh cksl
iz-34  ojnksyh lR;kxzg dk usr`Ro fdlus fd;kA
        ¼v½     ljnkj iVsy   ¼c½        egkRek xka/kh      ¼l½     fouksok Hkkos       ¼n½     fprjatunkl
iz-35  nsocan vkUnksyu dk izkjaHk 1866 esa fdlus fd;k FkkA
        ¼v½     lS;n vgen  ¼c½        lfj;r vYykg  ¼l½       'kkgoyh mYyk    ¼n½     dkfle ukuksroh
iz-36  x.kifr egksRlo dk 1893 esa izkjaHk fdlus fd;k FkkA
        ¼v½     xksiky d`".k xks[kys   ¼c½  cky xaxk/kj fryd  ¼l½   ,e-th- jkukM+s     ¼n½ vkRekjke ikMqdj
iz-37  tkfy;k okyk ckx gR;kdk.M dh tkWp ds fy, dkSu lk vk;ksx xfBr fd;k x;kA
        ¼v½     jSys vk;ksx    ¼c½ eSdMksukYM vk;ksx         ¼l½     g.Vj vk;ksx     ¼n½     oqM~l vk;ksx
iz-38  Hkkjr esa igyh ckj ekSfyd vf/kdkjksa dks fdlesa n’kkZ;k x;kA
¼v½     lkbeu deh’ku   ¼c½     usg: fjiksVZ      ¼l½     xka/kh bjfou le>kSrk       ¼n½     1909 dk vf/kfu;e
iz-39  lfou; voKk vkUnksyu esa xka/kh th us nk.Mh ;k=k dk izkjaHk dc fd;k FkkA
        ¼v½     12 ekpZ 1930    ¼c½      6 ekpZ 1930      ¼l½     6 vizSy 1930             ¼n½     12 vizSy 1930
iz-40  la?kh; O;oLFkk dk fuekZ.k fdl vf/kfu;e ds rgr gqvkA
        ¼v½     1909 vf/kfu;e  ¼c½       1919 vf/kfu;e     ¼l½   1935 vf/kfu;e           ¼n½     1947 vf/kfu;e
iz-41  fuEu esa ls fdlus fdzIl fe’ku dks ^^iksLV MsVsM psd** dh laKk nhA
        ¼v½     tokgj yky usg: ¼c½     egkRek xka/kh       ¼l½    ljnkj iVsy              ¼n½     ekSykuk vktkn
iz-42  1940 dk vxLr izLrko fdl ok;ljk; }kjk yk;k x;kA
        ¼v½ ykMZ bjfou      ¼c½   ykMZ fjfMax       ¼l½     ykMZ fyufyFkxks   ¼n½     ykMZ ososy
iz-43  Hkkjr esa egkRek xka/kh }kjk pyk;k x;k izFke lR;kxzg dkSu lk FkkA
        ¼v½     pEikj.k lR;kxzg   ¼c½       [ksM+k lR;kxzg  ¼l½      vlg;ksx vkUnksyu        ¼n½     O;fDrxr lR;kxzg
iz-44  eqfLye yhx us izR;{k dk;Zokgh fnol dc euk;kA
        ¼v½     16 vxLr 1946       ¼c½  16 vxLr 1944  ¼l½      16 vxLr 1940           ¼n½     16 vxLr 1942
iz-45  gM+i uhfr dk lw=ikr fdl xouZj tujy }kjk fd;k x;kA
        ¼v½     ykWMZ dSfuu           ¼c½          ykWMZ oSystfy     ¼l½     ykWMZ MygkWth     ¼n½     ykWMZ fjiu
iz-46  fuEu esa ls fdlus rhuksa xksyest lEesyuksa esa Hkkx fy;k FkkA
        ¼v½     egkRek xka/kh          ¼c½          ch-vkj- vEcsMdj  ¼l½     eksrh yky usg: ¼n½       fprjatunkl
iz-47  egkRek xka/kh us ^^djks ;k ejks** dk ukjk fdl vkUnksyu esa fn;k FkkA
        ¼v½     vlg;ksx vkUnksyu                                        ¼c½      Hkkjr NksM+ks vkUnksyu      
¼l½     lfou; voKk vkUnksyu                                    ¼n½     f[kykQr vkUnksyu
iz-48  Hkkjr ds izFke xouZj tujy FksA
        ¼v½     okjsu gsfLaVx    ¼c½       ykMZ fofy;e cSafVd       ¼l½     ykMZ Dykbo      ¼n½     ykWMZ dtZu
iz-49  iwuk le>kSrk fdlds e/; gqvk FkkA
        ¼v½     xka/kh & vEcsMdj    ¼c½   xka?kh & usg:     ¼l½     xka/kh & bjfou    ¼n½     dkxzsal & eqfLye yhx
iz-50  10 ebZ 1857 dks dzkafr dk izkjaHk dgkWa ls gqvkA
        ¼v½     cSjdiqj          ¼c½      esjB            ¼l½     fnYyh           ¼n½     y[kum     
                                                                                                

Tuesday

राज्य के नीति निर्देशक तत्व

  • भारतीय संविधान में अनुच्छेद 36 से 51 तक में निर्देश के रूप में ऐसे प्रावधान शामिल किये गए है जिन्हें राज्यों (केंद्र या राज्य सरकार) को पालन करना चाहिए और इनके पालन से भारत एक कल्याणकारी राज्य बन सकता है |
    राज्य के नीति निर्देशक तत्व एक आदर्श प्रारूप हैं लेकिन सरकार इसका पालन ही करे, ऐसी बाध्यता नहीं है इसलिए इनके पालन न करने की स्थिति में न्यायालय में याचिका दायर नहीं की जा सकती है |
    मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक तत्व में मुख्य अन्तर यह है की जहाँ मौलिक अधिकार व्यक्ति के लिए है तो वहीँ नीति निर्देशक राज्य (सरकारों) के लिए है |

    कुछ प्रमुख नीति निर्देशक तत्व निम्न है |
    प्रारंभ के अनुच्छेदों में नीति निर्देशक तत्व को परिभाषित किया गया है 
    1)      अनुच्छेद 38:  राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाएगा सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय को सुनिश्चित करते हुए भारत को लोक कल्याण की दिशा में अग्रसर करेगा।
    2)      अनुच्छेद 39 : राज्य अपनी नीतियों का सञ्चालन इसप्रकार करेगा जिससे पुरुष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो |
    3)      अनुच्छेद 40 : राज्य ग्राम पंचायतों के गठन हेतु ऐसे कदम उठाएगा जिससे पंचायतो को स्वायत्त शासन की इकाई के रूप में कार्यक्षम बनाया जा सके |
    4)      अनुच्छेद 41 : -राज्य आर्थिक आर्थिक सामर्थ्य और विकास की सीमाओं के भीतर, काम पाने के, शिक्षा पाने के और बेरोजगारी, बुढ़ापा, बीमारी और निःशक्तता तथा अन्य अनर्ह अभाव की दशाओं में लोक सहायता पाने के अधिकार को प्राप्त कराने का प्रभावी उपबंध करेगा।
    5)      अनुच्छेद 42: राज्य विशेषतः महिलाओं के सम्बन्ध में काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता का उपबंध करेगा |
    6)      अनुच्छेद 43: राज्य कर्मकारों के कार्यक्षेत्र की परिस्थिति, न्यूनतम मजदूरी व सुविधा के सम्बन्ध में अपेक्षित प्रावधान करेगा |
    7)      अनुच्छेद 44 : राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में सभी नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता बनाने का प्रयास करेगा।
    8)      अनुच्छेद 45 : राज्य, इस संविधान के प्रारंभ से दस वर्ष की अवधि के भीतर सभी बालकों को चौदह वर्ष की आयु पूरी करने तक, निःशुल्क और ओंनवार्य शिक्षा देने के लिए उपबंध करने का प्रयास करेगा ।
    (४६वें संविधान द्वारा संशोधन के पश्चात् नया प्रावधान : -राज्य सभी बालकों के लिए छह वर्ष की आयु पूरी करने तक, प्रारंभिक बाल्यावस्था देख-रेख और शिक्षा देने के लिए उपबंध करने का प्रयास करेगा।)
    9)      अनुच्छेद 46 : राज्य, जनता के दुर्बल वर्गों (विशेषतः अनुसूचित जातियों और जनजातियों) के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा और सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से उसकी संरक्षा करेगा ।
    10)   अनुच्छेद 47: राज्य, नागरिक के पोषणस्तर व जीवन स्तर की वृद्धि हेतु लोकस्वास्थ्य, औषधि निर्माण, नशामुक्ति के सम्बन्ध में आवश्यक प्रावधान करेगा |
    11)   अनुच्छेद 48: राज्य, देश के पर्यावरण के संरक्षण तथा संवर्धन का और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा
    12)   अनुच्छेद 49: राज्यराष्ट्रीय महत्व के संस्मारकों, स्थानों और वस्तुओं के संरक्षण हेतु विशेष प्रयास करेगा |
    13)   अनुच्छेद 50: राज्य की लोक सेवाओं में, न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक्‌ करने के लिए राज्य कदम उठाएगा ।
    14)   अनुच्छेद 51: अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि हेतु राज्य प्रयास करेगा |

    भारत के सन्दर्भ में "राज्य के नीति निदेशक तत्व" का महत्व :
    Ø  इन प्रावधानों के माध्यम से समाज के कमजोर वर्गों के लिए राजनीतिकआर्थिक एवं सामाजिक न्याय को सुरक्षित किया जा सकता है |
    Ø  ये नागरिकों के अवसर व पद की समानता सुनिश्चित करते है |
    Ø  ये व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता, अखंडता को सुनिश्चित करते है |
    Ø  सरकार नैतिक रूप से बाध्य है (कानूनी रूप से नहीं) की वह कमजोर वर्ग के हित में कोई कदम उठाये |
    Ø  ये प्रावधान अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा को बढ़ावा देने में राष्ट्र की भूमिका सुनिश्चित करते है |


Thursday

मध्य प्रदेश के प्रमुख लोकनृत्य


1) करमा नृत्य : मध्य प्रदेश के गोंड और बैगा आदिवासियों का प्रमुख नृत्य है | जो मंडला के आसपास क्षेत्रों में किया जाता है | करमा नृत्य गीत कर्म देवता को प्रशन्न करने के लिए किया जाता है | यह नृत्य कर्म का प्रतीक है | जो आदिवासी व लोकजीवन की कर्म मूलक गतिविधियों को दर्शाता है | यह नृत्य विजयदशमी से प्रारंभ होकर वर्षा के प्रारंभ तक चलता है |
ऐसा माना जाता है की करमा नृत्य कर्मराजा और कर्मरानी को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है इसमें प्रायः आठ पुरुष व आठ महिलाएं नृत्य करती है | ये गोलार्ध बनाकर आमने सामने खड़े होकर नृत्य करते है | एक दल गीत उठता है और दूसरा दल दोहराता है | वाध्य यन्त्र मादल का प्रयोग किया जाता है नृत्य में युवक युवती आगे पीछे चलने में एक दुसरे के अंगुठे को छूने की कोशिश करते है |
बैगा आदिवासियों के करमा को बैगानी करमा कहा जाता है ताल और लय के अंतर से यह चार प्रकार का होता है | 1) करमा खरी 2) करमा खाय 3) करमा झुलनी ४) करमा लहकी |
संक्षेप में करमा नृत्य की विशेषताएं :
·        यह नृत्य कर्म को महत्त्व देने वाला है |
·        यह गौंड, बैगा जनजाति के कृषकों द्वारा किया जाता है |
·        यह नृत्य गीत, लय, ताल के साथ पद सञ्चालन पर आधारित है |
·        करमा नृत्य जीवन की व्यापक गतिविधियों से सम्बंधित है |
·        यह नृत्य दशहरे से वर्षाकाल के आरम्भ अर्थात अक्टूबर से जून तक चलता है |


2) राई नृत्य : मध्य प्रदेश के प्रमुख लोकनृत्य राई को इसके क्षेत्र के आधार पर दो भागों में बांटा जा सकता है | बुंदेलखंड का राई नृत्य और बघेलखंड का राई नृत्य |
बुंदेलखंड का राई नृत्य : राई नृत्य बुंदेलखंड का एक लोकप्रिय नृत्य है यह नृत्य उत्सवों जैसे विवाह, पुत्रजन्म आदि के अवसर पर किया जाता है |  अशोकनगर जिले के करीला मेले में राई नृत्य का आयोजन सामूहिक रूप से किया जाता है | यहाँ पर लोग अपनी मन्नत पूर्ण होने पर देवी के मंदिर के समक्ष लगे मेले में राई नृत्य कराते है | यह राई का धार्मिक स्वरुप है | राई नृत्य के केंद्र में एक नर्तकी होती है जिसे स्थानीय बोली में बेडनी कहा जाता है | नृत्य को गति देने का कार्य एक मृदंगवादक पुरुष द्वारा  किया जाता है | राई नृत्य के विश्राम की स्थिति में स्वांग नामक लोकनाट्य भी किया जाता है जो हंसी मजाक व गुदगुदाने का कार्य करता है | विश्राम के उपरांत पुनः राई नृत्य प्रारंभ किया जाता है | अन्य लोकनृत्यों में जो बात प्रायः नहीं पाई जाती है वह है राई में पाई जाने वाली तीव्र गति, तत्कालीन काव्य रचना और अद्वितीय लोक संगीत | संगीत में श्रृंगार व यौवन झलकता है |
बघेलखंड का राई नृत्य : बुंदेलखंड की तरह बघेलखं में भी राई नृत्य किया जाता है परन्तु यहाँ पर नृत्य में कुछ विभेद आ जाते है जैसे बुंदेलखंड में राई नृत्य बेडनी द्वारा किया जाता है वहीँ बघेलखंड में पुरुष ही स्त्री वेश धारण कर राई नृत्य प्रस्तुत करते है इसके अतिरिक्त बुन्देलखंड में वाद्ययंत्र के तौर पर मृदंग का प्रयोग किया जाता है वहीँ बघेलखंड में ढोलक व नगड़िया का उपयोग किया जाता है | बघेलखंड में राई नृत्य विशेष रूप से अहीर पुरुषों द्वारा किया जाता है परन्तु कहीं कहीं पर ब्राम्हण स्त्रीयों में भी इसका प्रचलन पाया जाता है | पुत्र जन्म पर प्रायः वैश्य महाजनों के यहाँ पर भी राई नृत्य का आयोजन किया जाता है | स्त्रियाँ हाथों, पैरों और कमर की विशेष मुद्राओं में नृत्य करती है | राई नृत्य के गीत श्रृंगार परक होते है | स्त्री नर्तकियों की वेश-भूषा व गहने परंपरागत होते है | पुरुष धोती, बाना , साफा, और पैरों  में घुंघरू बांधकर नाचते है | 


3) बधाई नृत्य :  बुंदेलखंड क्षेत्र में जन्म, विवाह और त्योहारों के अवसरों पर बधाईं' लोकप्रिय है। इसमें संगीत वाद्ययंत्र की धुनों पर पुरुष और महिलाएं सभी, ज़ोर-शोर से नृत्य करते हैं। नर्तकों की कोमल और कलाबाज़ हरकतें और उनके रंगीन पोशाक दर्शकों को चकित कर देते है।

4) भगोरिया नृत्य : भगोरिया नृत्य अपनी विलक्षण लय और डांडरियां नृत्य के माध्यम से मध्यप्रदेश की बैगा आदिवासी जनजाति की सांस्कृतिक पहचान बन गया है। बैगा के पारंपरिक लोक गीतों और नृत्य के साथ दशहरा त्योहार की उल्लासभरी शुरुआत होती है। दशहरा त्योहार के अवसर पर बैगा समुदाय के विवाहयोग्य पुरुष एक गांव से दूसरे गांव जाते हैं, जहां दूसरे गांव की युवा लड़कियां अपने गायन और डांडरीयां नृत्य के साथ उनका परंपरागत तरीके से स्वागत करती है। यह एक दिलचस्प रिवाज है, जिससे बैगा लड़की अपनी पसंद के युवा पुरुष का चयन कर उससे शादी की अनुमति देती है। इसमें शामिल गीत और नृत्य, इस रिवाज द्वारा प्रेरित होते हैं। माहौल खिल उठता है और सारी परेशानियों से दूर, अपने ही ताल में बह जाता है।